गुरुवार, 3 सितंबर 2015

इतने पर भी

घनघोर गए चढ़ दिशाओं पर,
विलुप्त; सो गई दिशाएँ
घोर तिमतिमाहट में।
करता पतंग-बाजी शीतल-प्रभंजन
गया झकझोर जुल्फें।
पट उर-धरा के खोल
तरू ने है भरी आह।

पल्लव हो सवार मारूत-यान में
रहे हैं जा मिलने व्योम से
झुला है रहा वायु
वन-उपवन अपनी क्रोड़ में।
सांय-सांय करती हवाओं में
उठी है चमक चपला।
रही है चल उठापटक जलधि में
सब क्यों आज इतना गतिमान
दिया खोल दिल वारिद ने।

सूं सूं करता है आ रहा
जल वारिद
है चाहता उतरा दिल कण-कण के
अछुता ना रहे कोई
है सबको करना तरबतर
सर-सरोवर,सागर।
फड़फड़ाहट टपटपाहट की है बढ़ रही भरमार।
भीग गया हूँ मैं
गया कुद सरोवर में
बिन खोले पट ।
स्पंदित हैं आज रदपट
विचुम्बित कर झिरमिर बूँदें।

चीर हैं रहे दिल तरूओं का
झोंके तीक्ष्ण वेगमयी
किया है अतिचार
वक्ष-कलियों पर
कामनामयी है उसकी  हुंकार उठी।

हर्षा उठे अवनी अम्बर
कैसी लीला रास रचाई
खिल उठा रोम-रोम
कैसी यह
हाय! हलचल।

बाहर है कितनी सर्द
जल कितना उष्ण
तेर रहा हूँ मैं सरोवर में
गए पहुँच कुछ तट-सागर पर भी।

गाज गिरी है पत्थरों पर
पहाड़ों का दिल है गया पिंघल
बह रहे हैं निर्झर
दौड़ रही नदियाँ
कर ली है स्पर्श सागर ने सम्पूर्ण धरा आज।
वो ना कभी भीगेंगे
गए रह जो सूखे
इतने पर भी।

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