शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

नजर का कहर

रो-रो कर कविताएँ लिखता रहा तेरी याद में
तुमसे मिलने की करता रहा फरियाद मैं
बैचेन धडकनें धड़कती रहीं
गर्म साँसें तड़पती रहीं
व्याकुल नजरें टिकी रही तेरी राह में

उन नजरों का क्या करें
जो चली गई हमें निहार कर
खुमारी मिटती नहीं तेरी नजर की
मिलते रहे हम तुम से ख़्वाब में
जमाने की क्या कहें
हम खुद ही रोते रहे तेरे इन्तजार में

हर साँस में लिखा है तेरा नाम
हर आवाज पर लिखा है तेरा पैगाम
कुदरत ने किया है ऐसा काम
कि हर आहट में छिपी है तेरी पदचाप
हमें तुम्हारा इन्तजार रहेगा
कब आओगे आप .

बुधवार, 2 जून 2010

सिर्फ तुम्हारा इन्तजार

मेरे दिल की गहराईयों को
कभी छू ना सकोगे तुम
अगर छू लिया
दूर मुझसे कभी जा न सकोगे तुम

जब तक तुम पहचान न लोगे मुझे
खुद को छुपाता रहूँगा तुझसे
मेरे अंतस में प्रवेश की चाबी होगी
यह कसौटी तुम्हारी

मुझे जानो-पहचानो
और उतर जाओ
मेरे अंतस की गहराईयों में

सिर्फ तुम्ही आ सकते हो यहाँ
कोई और ना समझ पाएगा मुझे इस जहां में
सिवाए तुम्हारे
कोई और ना उतर पाएगा इन गहराईओं में
मुझे सदा तुम्हारा इन्तजार रहेगा .

बुधवार, 4 नवंबर 2009

मैं टहनी हूँ

टहनियों से पत्ते अलग होते रहते हैं
कुछ हवाओं से
तो कुछ पक कर गिर जाते हैं
दुनिया में लोग आते हैं
और चले जाते हैं
कुछ वक्त से चले जाते हैं
तो कुछ बेवक्त जाते हैं

दोस्त बनते हैं
बिगड़ते हैं
कुछ चले जाते हैं
कुछ नए आ जाते हैं
दुनिया एक पर खत्म नहीं होती
एक जाता है
तो दूसरा आ जाता है

मुझे गिरे पत्तों पर आँसू बहाने की आदत नहीं
हालाँकि मैं उनको बचाने की पूरी कोशिश करता हूँ
पर कुछ के गिरने के बाद
कुछ नई कोंपलें प्रस्फुटित हो जाती हैं
जो कल के नए पत्ते होंगी .

सोमवार, 19 अक्टूबर 2009

वो कब मिलेगी

आज अचानक ही
किसी हसीना से आँखें मिल गई
मिली ऐसी कि
कुछ देर के लिए ठहर गई
आँखें न जाने क्या बतियाई
कि कुछ देर में ही अपनापन हो गया

वो चले गए
हम वहीं देखते रह गए
वो वापस हमारे पास आए
कुछ पल ठहरे
हम फ़िर भी कुछ न बोल पाए
और चले आए

जब उनका अपनापन याद आता है
तो रोना आता है
न जाने वो कहाँ चली गई
हमें गम प्यारा सा दे गई
कोई हमारा होना चाहता था
फ़िर भी न हो पाया .

भविष्य भारत का

लो !ये पड़ा है बिखरा
भविष्य भारत का
कच्ची बस्ती
व्यस्त सड़कों के
किनारों ठहरे पर
रहा है मूंगफली,अख़बार बेच
थामे हैं कटोरा करों में मलिन शेष

लो !ये तल रहा हैं भुजिये
भविष्य भारत का
गर्मागर्म झर्र से
हाथों सुकुमार से
ला रहा हैं, परोस नाश्ता,चाय ऊपर मेज
मरा रहा है पौचे सेठ ,शीघ्र भेज

लो !ये तले आसमान गया लुढक
भविष्य भारत का
किंचित भूखा,किंचित नंगा
बनी हैं बिस्तर सड़कें
क्या जाएगा पढने उठ तड्के?

लो !ये नाक-भौंह ली चढा
वर्ग संभ्रात ने
देख भविष्य भारत का
लो !आज हो गया उपेक्षित
भविष्य भारत का .

सोमवार, 12 अक्टूबर 2009

संभावना सफलता की

संपर्क पारस में जब आया लोहा
बन गया सोना
कुंदन हुआ तपकर आग में
माना कि पारस संपर्क में
लोहा बन गया सोना

पर गुण यह लोहे में होता है
कि बन जाए सोना,
बनना नहीं हीरे-मोती
कंकर-पत्थर के भाग में
लगाओ कोई भी जंतर-मंतर
या रखो पारस संपर्क में .

गुरुवार, 24 सितंबर 2009

क्रांति

रज-कण हैं सोचते रोज
सदियों से,आदि काल से
पद-दलित हो जीते हैं
बोझ चराचर का सहते हैं


बनाई हैं कर छिनभिन हमें
जीवों ने कन्दराएँ
फोड़ सर रखी नींव
प्रसादों की मानवों ने
चीर के सीना हैं फसलें लहलाई
फ़िर भी सत्ता अपनी खाक कहलाई


सोच यह उद्वेलित हुए रज- कण
बवंडर बन झकझोरा है चराचर को
चढ़ गए आसमान
वृक्षों को है धकेला
झुक गए वो बच गए
टक्कराए वो टूट गए


फड़फड़ा उठी खिड़कियाँ प्रसादों की
गवाक्ष गई मूंद
घोट दिया गला आसमान का
बिखरा पड़ा है खून ही खून .