बरसात के महीनों में सूने खेतों में खेलती तलियारास्ते की छपाछपऔर मिट्टी की वो गंध बहुत याद आती हैधरती के झरोखों से झांकती बाजरे की नई कोपलें और वो मन्दिम हरियाली सूरज ढलने पर सिहरन ठंडी हवाओं की बहुत याद आती है चिलकती धूप में तपते मार्ग कोमलता बाजरे के सिट्टों की उमस में घुली बाजरे की वो गंध बहुत याद आती है गर्मी के महीनों मेंगली-गली मेंपसरा पड़ा सन्नाटा खामोश झोंपड़ियों के आँगन निर्जन खेत और वो पेडो की छाँव में दुबके पशु-पक्षी बहुत याद आते हैंलू का समंदर डूबोता हुआ गाँव-ढाणी-खेत लहरा रहा हैं ऐसे में सर पर मंदासी मांडेखेत की ओर बढते वो किसान बहुत याद आते हैं
हरशाम पक्षियों का कोलाहल
के झुंड पेड़ों पर
तालाब को घेरे भेड़-बकरियाँ बछडों की ओर दोड़ना भेंसों और गायों का वो चद्ती रात और
सबका खुले आसमान तले सो जाना -गाय की जुबाली की आवाज
भेड़ों की छींकें,ऊँटों की लुतलुती ये सब बहुत याद आते हैं
सर्दी के वो सुहाने दिन
धूप का खिलना
और सूरज का छिपना
धुंध और कोहरा
सुबह शाम सर्दी का पहरा
बहुत याद आता हैं
सरसों की लहलाती फसल और सुगों की टाँय-टाँय ताप अलावते बुडे-बुजुर्ग और गोद में छिपे बच्चे बहुत याद आते हैं
रात को ताऊ की पोली में हुक्के की आवाज लोरी सुना रही है-गुड्ड-गुड्ड सबको प्यारी नींद सुला रही है बहुत याद आ रही है .