मंगलवार, 20 नवंबर 2018

आज मोहब्बत पर

आज मोहब्बत पर तिजारत भारी हो गई
कैसे उकेरें प्रेमी युगल अपने नाम
ऊद्यान में खड़े पेड़ों के तनों पर
पुराने भवनों और इमारतों की दीवारों पर
सब जगह पाबंदी हो गई।

वो नदी के मुहाने और
समुद्र के साहिल पुकार रहे हैं
प्रेमी युगलों को

पुकार रही हैं सुनसान भवनों की दीवारें
कोई प्रेमी युगल आए
कुरेद कर उनके दिलों को
अपने प्यार का पैगाम लिख जाए
नीरस पड़ा है जीवन
इसमें कोई प्रेम रस भर जाए।

फूलों की भी है ख्वाहिश कुछ ऐसी
जमींजद होने से पहले
कोई प्रेमी अर्पित कर मुझे प्रेयसी को
मेरा जीवन धन्य कर जाए।

कोयल बुला रही मोहब्बत करने वालों को
तुम बैठो पेङ के नीचे
मैं तुम्हारे लिए गीत गाऊंगी
प्रेमी चले दूर इन बहारों से
आज कोयल तन्हा हो गई।

मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

ख्वाहिशें

कुछ ख्वाहिशें अधूरी रह गई
कुछ हो गई पूरी
इस छोटे से जीवन में
संघर्ष की तप्त दोपहर में
कच्ची कोंपल सी मुरझा गई
वो ख्वाहिशें जो अधूरी रह गई।

मासूम चेहरा तपकर तव्वा हो गया
कानों ने बंद कर दिए
ताने सुनना जमाने के
मानो बहरा हो गया
संघर्ष की पहचान अब
मेरा चेहरा हो गया।

कुछ खुशियां चली गई
कुछ लौट आई
गमों ने घर बना लिया मेरे आँगन में
उसी के साए में जीता हूँ
गमजदा ही मेरी जिंदगी की
अब पहचान हो गई।

हँसता है जमाना तो
उसकी हँसी में शरीक हो लेता हूँ
मुझे शौक नहीं रहा
चिकनी-चुपङी का
रूखी-सूखी में जी लेता हूँ
गमों को जाम समझकर पी लेता हूँ।

प्यार-मोहब्बत की बातें
पुरानी हो गई
जमाना भले ही करे बेवफाई
मुश्किलें अब मेरी दीवानी हो गई।

रविवार, 22 नवंबर 2015

समझदार कौन

कोई कहता है दुनिया को
राम ने बनाया
कोई कहता है अल्लाह ने
कोई ईसा की बनाई हुई बताता है।

दुनिया एक है तो यह कैसे संभव
या तो सबने मिलकर बनाया होगा
या राम, अल्लाह सब एक ही के नाम हैं
इन बातों को तो साधारण जन भी जानता है।

पर कुछ विद्वान मानने को तैयार ही नहीं
ऐसे विद्वानों से तो
मुझे वो रिक्शे वाला
समझदार लगता है
जो दिनभर जी तोड़ मेहनत करके
अपने परिवार को पालने और
खुद सड़क किनारे
रुखी रोटी खाकर
बदबूदार नाली के पास बिना बिस्तर
रिक्शे पर ही सोने का साहस रखता है।

शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

आज मुझे एतराज़ नहीं

आज मुझे एतराज़ नहीं
वृद्ध होने से
ना ही कोई भय
वृध्दावस्था आज मुझे स्वर्ग के द्वार पर स्वागत में खड़ी अप्सरा नज़र आती है।

बुढ़ापे का भी एक अपना ही मजा है
किसी कोने में बैठकर बीते जीवन का मूल्यांकन करने का
बचपन, जवानी की बातें याद करने का।

पोते-पोतियों और नातियों को
आंगन में खेलते देखना
नई पीढियों का उल्लास देखना
याद करना अपनी मौज को
अपने अतीत के अवलोकन का भी
एक अपना ही मजा है।

दर्शकदीर्घा में बैठे खिलाड़ी
सभी कर्मों से निवर्त्त
दृष्टा मात्र
दिनभर की थकान के बाद
संध्या होने पर
खेत को निहारती खुशनुमा आंखें
और घर लौटने से पहले का आराम है बुढापा।

जिसने खेत में काम नहीं किया
और संध्या हो जाए तो माथे पर
चिंता की लकीरें उभरना स्वभाविक है लेकिन जो जी-जान से काम करके
थक चुका है
उसके लिए यह संध्या
किसी वरदान से कम नहीं।

आज मुझे एतराज़ नहीं
वृद्ध होने से
ना ही कोई भय
वृध्दावस्था आज मुझे स्वर्ग के द्वार पर स्वागत में खड़ी अप्सरा नज़र आती है।

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015

अनदेखी

क्यों कर रहे उस रावण को कलंकित?
जो था शिव भक्त,जो था विद्वान
किए जिसने भक्ति में दस शीश कुर्बान।

किया सीताहरण घमण्ड से
तो पापमुक्त हुआ मृत्यु दंड से
आज तो हैं पापी बड़े रावण से
बिना भक्ति, बिना ज्ञान के।

फिर भी हम कितने अंधे हैं
मनाते दशहरा
जलाते पुतला रावण का
दुष्ट जान के।
कलयुग में दुष्ट पहनते हैं चोला राम का
काले करते धंधे हैं।

खून चूस गरीबों का
खेल बताते नसीबों का।

एेसा भी क्या कसूर था उस रावण का
आज तो रेप-मर्डर होते खुलेआम
खुले घूम रहे अपराधी आराम से।

कह सके ना उनको कोई कुछ
करते हैं कर्म तुच्छ से तुच्छ।

अब घूम रहे रावण अपार
कितने राम लेंगे अवतार।

क्यों कर रहे उस रावण को कलंकित
आज तो सुरक्षित नहीं
अबोध बच्ची और पड़ौसी की नारियाँ
उस रावण के घर तो पवित्र थी शत्रु की भार्या
क्यों कर रहे उस रावण को कलंकित?

गुरुवार, 3 सितंबर 2015

निगाहें

उन निगाहों से क्या घबराना
जो झुकती नहीं सम्मान में
जो झुकती नहीं प्यार से।

इस जहाँ में निगाहें बदनाम
भी होती हैं कत्ल के इल्ज़ाम में

निगाहें शिकारी होती हैं
शिकार भी निगाहें होती हैं।

निगाहों से निगाहें मिलाकर
निगाहों से करना तकरार
निगाहों ही निगाहों में
होती निगाहें अंगीकार।

निगाहें उठती हैं
निगाहें गिरती हैं

निगाहों से उठते हैं
निगाहों से गिरते हैं लोग

निगाहों से होता इंकार है
निगाहों से होता इकरार।

निरीह, निर्दय, निसंग होती हैं निगाहें
निर्मोह, निर्भय,निर्निमेष भी होती हैं निगाहें।

गुमशुम निस्वर निगाहें
खालिश अभिव्यक्त हैं निगाहें।
निगाहों से बनते बिगड़ते निबंध।

स्थिर भी हैं निगाहें
चंचल भी हैं निगाहें
चमत्कारी भी होती हैं निगाहें
करिश्मा करती हैं, कहर भी ढा़हती हैं निगाहें
कातर भी होती हैं निगाहें।

निगाहों में जलवा है
निगाहों से जलते हैं लोग।
निगाहों से तड़पते,मचलते हैं तन-मन।

निगाहों में आते हैं
निगाहों से ओझल होते हैं लोग।।

इतने पर भी

घनघोर गए चढ़ दिशाओं पर,
विलुप्त; सो गई दिशाएँ
घोर तिमतिमाहट में।
करता पतंग-बाजी शीतल-प्रभंजन
गया झकझोर जुल्फें।
पट उर-धरा के खोल
तरू ने है भरी आह।

पल्लव हो सवार मारूत-यान में
रहे हैं जा मिलने व्योम से
झुला है रहा वायु
वन-उपवन अपनी क्रोड़ में।
सांय-सांय करती हवाओं में
उठी है चमक चपला।
रही है चल उठापटक जलधि में
सब क्यों आज इतना गतिमान
दिया खोल दिल वारिद ने।

सूं सूं करता है आ रहा
जल वारिद
है चाहता उतरा दिल कण-कण के
अछुता ना रहे कोई
है सबको करना तरबतर
सर-सरोवर,सागर।
फड़फड़ाहट टपटपाहट की है बढ़ रही भरमार।
भीग गया हूँ मैं
गया कुद सरोवर में
बिन खोले पट ।
स्पंदित हैं आज रदपट
विचुम्बित कर झिरमिर बूँदें।

चीर हैं रहे दिल तरूओं का
झोंके तीक्ष्ण वेगमयी
किया है अतिचार
वक्ष-कलियों पर
कामनामयी है उसकी  हुंकार उठी।

हर्षा उठे अवनी अम्बर
कैसी लीला रास रचाई
खिल उठा रोम-रोम
कैसी यह
हाय! हलचल।

बाहर है कितनी सर्द
जल कितना उष्ण
तेर रहा हूँ मैं सरोवर में
गए पहुँच कुछ तट-सागर पर भी।

गाज गिरी है पत्थरों पर
पहाड़ों का दिल है गया पिंघल
बह रहे हैं निर्झर
दौड़ रही नदियाँ
कर ली है स्पर्श सागर ने सम्पूर्ण धरा आज।
वो ना कभी भीगेंगे
गए रह जो सूखे
इतने पर भी।

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

महाभारत-कर्मयोग

उठो जागो !
वीर धुरंधर ओजस्वी
आकुल हो क्यों 
व्याकुल हो क्यों 
उठा गांडीव 
मचा तांडव 
पड़ा क्यों पीर पकड़ के
 ठोक दे सीना तीर पकड़ के 

धीरज धर ओ वीर तूँ 
क्यों अधीर हुआ है तेरा मन 

सागर सा उमड़ा ह्रदय 
अब किसे डूबोयेगा 

खड़े हैं कौरव 
युद्ध को तुझे ललकार रहे 

क्या निज भ्राता पर ही 
बाण चलाऊंगा 
मार के वंशज अपना 
क्या सुखी मैं हो पाउँगा 

तेरा कौन है
किसका है तूँ प्यारे 
सब जीव न्यारे-न्यारे 
हर जन्म संगम न्यारे-न्यारे 
पाताल कभी तेरा था 
धरती कभी मेरी थी 
क्या पता तुझे -
 जाने किसका था आसमान 

तू देख चूका है दुनिया को 
दानव सी दहाड़ सुन के 
चीत्कार उठी है कोमलता 

विश्व विज्ञान तुम्हे सिखाऊँ 
उठ ओ उठ वीर तेजस्वी 
क्यों पड़ा मंदिम-
मुख-मंडल तेज ओजस्वी 

भाइयों का भार उठेगा ना मेरे कंधों पर 

तो ये सच है कि तूँ जायेगा उनके कन्धों पर 
हुंकार उठा है मंडल 
अब तूँ सोच रहा है जाऊं मैं 
आनन्-फानन में कानन 
ले हाथ कमंडल। ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,लगातार

शुक्रवार, 16 नवंबर 2012

कमाई

कर -कर चालबाजी खूब घूस कमाई
गरीबों को डरा-डरा खूब धोंस जमाई 
इमां बेचा,इज्जत बेची;करी खोटी कमाई
भूल गया भाईचारा
रिश्ते तोड़े,नाते तोड़े
नियत बिगाड़ बना कसाई।

ईंट से ईंट बजाई जनता की
परवाह करी न ममता की
स्वार्थ के खातिर भाई-भाई के बीच खोदी खाई
पी के दारू खूब उत्पात मचाया
नचनिया  भी खूब नचाई .

सब कुछ भूल गया
निन्यानवे  के फेर में 
टूट गई  प्रभु से सगाई  
छोड़ गए सब साथ
बच्चे और लुगाई
कोई कम ना आया
जब मौत सर पर मंडराई।

किसके खातिर की खोटी कमाई 
काया और माया यहीं रह गई 
सब करे मेरी बुराई 
तुम रखना ध्यान 
बात ज्ञान की तुम्हे बताई .   

सोमवार, 12 सितंबर 2011

शिकायत

कुछ बेगाने हैं
उनसे शिकवा क्या करें
कुछ नादां हैं
उनसे शिकायत क्या करें
हमें उम्मीद नहीं उनसे मोहब्बत की
तो इनायत क्या करें

अगर जालीम है ज़माना
तो सराफत क्या करें

हम तो योंही लुटाते रहे मोहब्बत उनपर
अगर वो समझे इसे बेबसी हमारी
तो मोहब्बत क्या करें
हरपल योंही लुढ़कती है दुनिया
अपने ही बदल जाते हैं
तो बेगाने क्या करें

हर उम्मीद के साथ
एक आवाज आती है दिल के टूटने की
तो अफसाने क्या करें
सागर में तैर जाते हैं पत्थर भी
अगर डूब जाये इन्सान
तो सागर क्या करे .

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

नजर का कहर

रो-रो कर कविताएँ लिखता रहा तेरी याद में
तुमसे मिलने की करता रहा फरियाद मैं
बैचेन धडकनें धड़कती रहीं
गर्म साँसें तड़पती रहीं
व्याकुल नजरें टिकी रही तेरी राह में

उन नजरों का क्या करें
जो चली गई हमें निहार कर
खुमारी मिटती नहीं तेरी नजर की
मिलते रहे हम तुम से ख़्वाब में
जमाने की क्या कहें
हम खुद ही रोते रहे तेरे इन्तजार में

हर साँस में लिखा है तेरा नाम
हर आवाज पर लिखा है तेरा पैगाम
कुदरत ने किया है ऐसा काम
कि हर आहट में छिपी है तेरी पदचाप
हमें तुम्हारा इन्तजार रहेगा
कब आओगे आप .

बुधवार, 2 जून 2010

सिर्फ तुम्हारा इन्तजार

मेरे दिल की गहराईयों को
कभी छू ना सकोगे तुम
अगर छू लिया
दूर मुझसे कभी जा न सकोगे तुम

जब तक तुम पहचान न लोगे मुझे
खुद को छुपाता रहूँगा तुझसे
मेरे अंतस में प्रवेश की चाबी होगी
यह कसौटी तुम्हारी

मुझे जानो-पहचानो
और उतर जाओ
मेरे अंतस की गहराईयों में

सिर्फ तुम्ही आ सकते हो यहाँ
कोई और ना समझ पाएगा मुझे इस जहां में
सिवाए तुम्हारे
कोई और ना उतर पाएगा इन गहराईओं में
मुझे सदा तुम्हारा इन्तजार रहेगा .

बुधवार, 4 नवंबर 2009

मैं टहनी हूँ

टहनियों से पत्ते अलग होते रहते हैं
कुछ हवाओं से
तो कुछ पक कर गिर जाते हैं
दुनिया में लोग आते हैं
और चले जाते हैं
कुछ वक्त से चले जाते हैं
तो कुछ बेवक्त जाते हैं

दोस्त बनते हैं
बिगड़ते हैं
कुछ चले जाते हैं
कुछ नए आ जाते हैं
दुनिया एक पर खत्म नहीं होती
एक जाता है
तो दूसरा आ जाता है

मुझे गिरे पत्तों पर आँसू बहाने की आदत नहीं
हालाँकि मैं उनको बचाने की पूरी कोशिश करता हूँ
पर कुछ के गिरने के बाद
कुछ नई कोंपलें प्रस्फुटित हो जाती हैं
जो कल के नए पत्ते होंगी .

सोमवार, 19 अक्टूबर 2009

वो कब मिलेगी

आज अचानक ही
किसी हसीना से आँखें मिल गई
मिली ऐसी कि
कुछ देर के लिए ठहर गई
आँखें न जाने क्या बतियाई
कि कुछ देर में ही अपनापन हो गया

वो चले गए
हम वहीं देखते रह गए
वो वापस हमारे पास आए
कुछ पल ठहरे
हम फ़िर भी कुछ न बोल पाए
और चले आए

जब उनका अपनापन याद आता है
तो रोना आता है
न जाने वो कहाँ चली गई
हमें गम प्यारा सा दे गई
कोई हमारा होना चाहता था
फ़िर भी न हो पाया .

भविष्य भारत का

लो !ये पड़ा है बिखरा
भविष्य भारत का
कच्ची बस्ती
व्यस्त सड़कों के
किनारों ठहरे पर
रहा है मूंगफली,अख़बार बेच
थामे हैं कटोरा करों में मलिन शेष

लो !ये तल रहा हैं भुजिये
भविष्य भारत का
गर्मागर्म झर्र से
हाथों सुकुमार से
ला रहा हैं, परोस नाश्ता,चाय ऊपर मेज
मरा रहा है पौचे सेठ ,शीघ्र भेज

लो !ये तले आसमान गया लुढक
भविष्य भारत का
किंचित भूखा,किंचित नंगा
बनी हैं बिस्तर सड़कें
क्या जाएगा पढने उठ तड्के?

लो !ये नाक-भौंह ली चढा
वर्ग संभ्रात ने
देख भविष्य भारत का
लो !आज हो गया उपेक्षित
भविष्य भारत का .

सोमवार, 12 अक्टूबर 2009

संभावना सफलता की

संपर्क पारस में जब आया लोहा
बन गया सोना
कुंदन हुआ तपकर आग में
माना कि पारस संपर्क में
लोहा बन गया सोना

पर गुण यह लोहे में होता है
कि बन जाए सोना,
बनना नहीं हीरे-मोती
कंकर-पत्थर के भाग में
लगाओ कोई भी जंतर-मंतर
या रखो पारस संपर्क में .

गुरुवार, 24 सितंबर 2009

क्रांति

रज-कण हैं सोचते रोज
सदियों से,आदि काल से
पद-दलित हो जीते हैं
बोझ चराचर का सहते हैं


बनाई हैं कर छिनभिन हमें
जीवों ने कन्दराएँ
फोड़ सर रखी नींव
प्रसादों की मानवों ने
चीर के सीना हैं फसलें लहलाई
फ़िर भी सत्ता अपनी खाक कहलाई


सोच यह उद्वेलित हुए रज- कण
बवंडर बन झकझोरा है चराचर को
चढ़ गए आसमान
वृक्षों को है धकेला
झुक गए वो बच गए
टक्कराए वो टूट गए


फड़फड़ा उठी खिड़कियाँ प्रसादों की
गवाक्ष गई मूंद
घोट दिया गला आसमान का
बिखरा पड़ा है खून ही खून .

शनिवार, 19 सितंबर 2009

दुनिया का जीवन

उफ़! तौबा ये दुनिया
कितने गूढ-जटिल
रहस्यों से अटी पड़ी है
कितना स्वार्थ-प्रपंच है
कितना सीधापन

मकड़-जाल सी जिन्दगी
चलती-चलती गूँथ जाती है
मुड़ जाती है नई दिशा में
कोटि-कोटि रंग दुनिया के
निर्भर करती है द्रष्टा के नजरिये पर

चाहत की चमक है कहीं
घ्रणा का घोर तमस छाया है कहीं
बेवफाई से टूटा मन गमगीन
कहीं उत्साह से लबालब नवजीवन
खौफ रहित ,गमहीन
प्रमुखका परचम लहराते अमीर यहीं
दरिद्रता में डूबे दीन भी यहीं
किसी का जीवन
लहराती बगिया है
तो किसी का सुखा झार-झंखार
फूलों से लथपथ है किसी की बाहें
तो काँटों से भरी हैं किसी की राहें
किसी के भाग्य का सूरज चमक रहा है
तो किसी के फीके पड़े हैं सितारे
सारे शहर में है तन्हाई
प्रेम की तलास में भटकता जीव
समझ नहीं पा रहा
क्या सही,क्या गलत .

शनिवार, 5 सितंबर 2009

मेरे गाँव

बरसात के महीनों में
सूने खेतों में खेलती तलिया
रास्ते की छपाछप
और मिट्टी की वो गंध
बहुत याद आती है

धरती के झरोखों से
झांकती बाजरे की नई कोपलें
और वो मन्दिम हरियाली
सूरज ढलने पर
सिहरन ठंडी हवाओं की
बहुत याद आती है

चिलकती धूप में तपते मार्ग
कोमलता बाजरे के सिट्टों की
उमस में घुली बाजरे की वो गंध
बहुत याद आती है

गर्मी के महीनों में
गली-गली में
पसरा पड़ा सन्नाटा
खामोश झोंपड़ियों के आँगन
निर्जन खेत
और वो पेडो की छाँव में दुबके
पशु-पक्षी बहुत याद आते हैं

लू का समंदर डूबोता हुआ
गाँव-ढाणी-खेत
लहरा रहा हैं
ऐसे में सर पर मंदासी मांडे
खेत की ओर बढते वो किसान
बहुत याद आते हैं

हरशाम पक्षियों का कोलाहल

के झुंड पेड़ों पर
तालाब को घेरे भेड़-बकरियाँ बछडों की ओर दोड़ना भेंसों और गायों का वो चद्ती रात और
सबका खुले आसमान तले सो जाना -गाय की जुबाली की आवाज
भेड़ों की छींकें,ऊँटों की लुतलुती ये सब बहुत याद आते हैं

सर्दी के वो सुहाने दिन
धूप का खिलना
और सूरज का छिपना
धुंध और कोहरा
सुबह शाम सर्दी का पहरा
बहुत याद आता हैं

सरसों की लहलाती फसल और सुगों की टाँय-टाँय ताप अलावते बुडे-बुजुर्ग और गोद में छिपे बच्चे बहुत याद आते हैं

रात को ताऊ की पोली में हुक्के की आवाज लोरी सुना रही है-गुड्ड-गुड्ड सबको प्यारी नींद सुला रही है बहुत याद आ रही है .



शनिवार, 22 अगस्त 2009

तेरी याद में

हरपल आती है तेरी याद
फरियाद करते है खुदा से
किसी को न आए ऐसी जालिम याद

करवटों में गुजर जाती है,
ख्वाबों में कट जाती है रात
हर ख्वाब में तुमसे ही
होती है मुलाकात

जहन में सागर उमड़ रहा है,
तेरी यादों का
सिलसिला चलता रहता है,
कसमों और वादों का
सो नहीं पाते हैं
यों ही गुजर जाती हैं रात

सुबह तक सलवटें पड़ जाती हैं-
बिस्तर,दिल और आखों तले.
जब कभी गाता हैं कोई पपीहा
तेरी याद में जल उठते हैं दिलजले

तेरा खिलखिलाकर हँसना
शर्माकर मुस्कुराना
और खोजना नाराज होने का बहाना
एक से बढकर एक कातिलाना हमले हैं
तेरी याद में ऐसे फिसले हैं कि
आज तक नहीं संभले हैं.